ब्रांड की गारंटी या किस्मत की मार? एंबेसडरों की वायरल विडंबना”

ब्रांड एंबेसडर और ब्रांडेड विडंबना: विज्ञापन की दुनिया का सच्चा ‘सिनेमा’
विज्ञापन की दुनिया भी कमाल की है। यहां सब कुछ चमकदार है—मुस्कान भी, बाल भी, चाल भी और हाल भी। लेकिन कभी-कभी यह चमक इतनी तेज़ हो जाती है कि सच की आंखें ही चुंधिया जाएं। हाल में सोशल मीडिया पर वायरल कुछ तस्वीरों ने इसी चमक पर हल्का-सा सवालिया निशान लगा दिया है। तस्वीरों में बड़े नाम हैं, बड़े ब्रांड हैं और उनके साथ जुड़ी हुई कुछ दिलचस्प ‘विडंबनाएं’ भी।
पहली तस्वीर में सदी के महानायक कहे जाने वाले अभिनेता एक मोटी चादर में लिपटे दिखाई देते हैं। वही अभिनेता जो ठंड से बचाने वाले एक मशहूर ऊनी ब्रांड के एंबेसडर रहे हैं। अब तस्वीर में वे पूरी तरह से ढंके हुए हैं—मानो ठंड ने ब्रांड की परतों को भेदकर सीधे उन्हें चुनौती दे दी हो। सवाल उठता है—क्या ब्रांड की गरमी शूटिंग सेट तक सीमित थी? या फिर यह महज एक सामान्य क्षण था जिसे सोशल मीडिया ने व्यंग्य का हथियार बना लिया?

दूसरी तस्वीर में एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और उनके पति दिखते हैं। पति महोदय एक ऐसे हेयर ऑयल ब्रांड का चेहरा हैं जो गंजेपन को दूर करने का दावा करता है। मगर तस्वीर में उनका माथा अपनी ‘विस्तृत’ पहचान के साथ उपस्थित है। सोशल मीडिया को इससे बेहतर सामग्री और क्या मिलती? लोगों ने तुरंत निष्कर्ष निकाल लिया—“अगर एंबेसडर पर असर नहीं, तो हम पर क्या होगा!” हालांकि हकीकत यह है कि ब्रांड एंबेसडर होना किसी चमत्कार की गारंटी नहीं होता। वह एक व्यावसायिक अनुबंध होता है, कोई निजी इलाज नहीं।

तीसरी तस्वीर में एक नामचीन गीतकार व्हीलचेयर पर नजर आते हैं। विडंबना यह बताई जा रही है कि वे जोड़ों के दर्द की दवा के प्रचार से जुड़े रहे हैं। अब सोशल मीडिया का तर्क सीधा है—“दर्द मिटाने वाली दवा, और एंबेसडर व्हीलचेयर पर?” मगर क्या यह जरूरी है कि किसी दवा का प्रचार करने वाला व्यक्ति कभी बीमार न पड़े? क्या अभिनेता सुपरहीरो होते हैं, जिन्हें कभी सर्दी-जुकाम भी नहीं होता?

दरअसल, यहां असली मुद्दा तस्वीरें नहीं, हमारी अपेक्षाएं हैं। हम विज्ञापनों को यथार्थ मान बैठते हैं। विज्ञापन का काम है उम्मीद बेचना—कभी घने बालों की, कभी दर्द से राहत की, कभी सर्दी से सुरक्षा की। लेकिन हम भूल जाते हैं कि यह उम्मीद ‘ड्रामेटाइज्ड’ होती है। विज्ञापन एक कहानी है, जीवन नहीं। कैमरे के सामने जो दिखता है, वह ब्रांड की रणनीति का हिस्सा होता है, व्यक्ति की निजी हकीकत का नहीं।
व्यंग्य इसलिए जन्म लेता है क्योंकि हम विरोधाभास देख लेते हैं। और सच कहें तो यह विरोधाभास नया नहीं है। जो अभिनेता सॉफ्ट ड्रिंक पीते हुए दिखते हैं, वे निजी जिंदगी में शायद गुनगुना पानी पसंद करते हों। जो खिलाड़ी चिप्स का पैकेट लहराते हैं, वे अपनी डाइट में उसका नामोनिशान न रखते हों। फिर भी हम उनसे उम्मीद करते हैं कि वे वही हों जो विज्ञापन कहता है।
यह पूरा मामला हमें एक और बात सिखाता है—सेलिब्रिटी संस्कृति की अंधभक्ति से बाहर निकलने की। किसी बड़े नाम के जुड़ जाने से उत्पाद की गुणवत्ता स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाती। असली कसौटी उपभोक्ता का अनुभव और वैज्ञानिक प्रमाण हैं, न कि कैमरे के सामने बोला गया संवाद।
सोशल मीडिया के दौर में हर तस्वीर एक बयान बन जाती है। लोग स्क्रीनशॉट लेकर तर्क गढ़ते हैं, मीम बनाते हैं और कुछ ही घंटों में फैसला सुना देते हैं। लेकिन जरूरी है कि हम व्यंग्य का आनंद लेते हुए भी विवेक न खोएं। तस्वीरें संदर्भ से काटकर दिखाई जा सकती हैं, और हर दृश्य की अपनी कहानी होती है।
आखिर में, यह समझना होगा कि ब्रांड एंबेसडर इंसान ही होते हैं—उन्हें ठंड भी लगती है, बाल भी झड़ते हैं और घुटनों में दर्द भी हो सकता है। विज्ञापन एक पेशा है, परिपूर्णता का प्रमाणपत्र नहीं।
इसलिए अगली बार जब किसी एंबेसडर की ऐसी तस्वीर वायरल हो, तो मुस्कुराइए जरूर, पर साथ ही यह भी याद रखिए—विज्ञापन सिनेमा है, जिंदगी नहीं। और सिनेमा में हर चीज़ स्क्रिप्टेड होती है, सिवाय दर्शकों की उम्मीदों के।


