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कन्हैया मित्तल का विवादित बयान: शंकराचार्य को स्वीकारने से इनकार, योगी आदित्यनाथ को बताया अपना गुरु


भाजपा के नेता और लोकप्रिय भजन गायक कन्हैया मित्तल ने एक विवादित बयान में अभी वर्तमान में चर्चित शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया है। मित्तल का कहना है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना गुरु मानते हैं और इसी कारण वे शंकराचार्य के समर्थन या आलोचना में कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सकते।

बयान में क्या कहा गया?

मित्तल ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट (वीडियो/टेक्स्ट) में स्पष्ट कहा कि:

  • वे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के रूप में मानने से इनकार करते हैं।
  • उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई शंकराचार्य को शंकराचार्य मानता है, तो उसके चेलों और समर्थकों को भी उसके विचारों की महत्ता तभी मिलेगी जब वह योगी आदित्यनाथ के दृष्टिकोण के अनुरूप हों।
  • उनके शब्दों के अनुसार, योगी आदित्यनाथ उनके गुरु हैं, और इसलिए वे उनके विरुद्ध किसी भी प्रकार की आलोचना या टिप्पणी स्वीकार नहीं कर सकते।
कन्हैया मित्तल का वायरल वीडियो

बयान का यह रुख उस समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में माघ मेला और शंकराचार्य विवाद तेज़ी से राजनीतिक और धार्मिक बहस का विषय बना हुआ है।

शंकराचार्य विवाद का पृष्ठभूमि

प्रयागराज के माघ मेले के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। शंकराचार्य के ‘शंकराचार्य’ की उपाधि को लेकर मेला प्राधिकरण द्वारा नोटिस जारी किए जाने पर कानूनी और धार्मिक झगड़ा बन चुका है। उनके वकील ने मेला प्रशासन से नोटिस वापस लेने या कानूनी कार्रवाई का सामना करने की चेतावनी भी दी है।

सामाजिक और राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएँ दी हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाया है कि वह शंकराचार्य और साधुओं का अपमान कर रही है और सनातन धर्म का सम्मान नहीं कर रही है।

राजनीतिक और धार्मिक प्रतिक्रिया

  • राजनीतिक गलियारे से यह बयान भाजपा के भीतर तथा विपक्ष के बीच बहस का विषय बन गया है।
  • कुछ धार्मिक संगठनों ने कन्हैया मित्तल के रुख की आलोचना की है, जबकि कुछ लोग इसे भाजपा के राजनीतिक स्वार्थ में धर्म के नाम पर समर्थन जताने के रूप में देखते हैं।
  • विवाद की गहराई यह दिखाती है कि उत्तर प्रदेश में धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच मध्यमस्थता तथा सम्मान की राजनीति चल रही है।

क्या है विवाद की संवेदनशीलता?

शंकराचार्य का पद हिंदू धर्म की एक पुरानी और सम्मानित परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। पारंपरिक रूप से इस पद का निर्धारण धार्मिक, शास्त्रीय और सामाजिक मानदंडों के अनुसार होता है। इसका राजनीतिकरण धार्मिक भावनाओं को जोड़कर राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बनता जा रहा है।

कन्हैया मित्तल का बयान इस संवेदनशील विषय पर राजनीति की गहराई और धार्मिक नेतृत्व के बीच सत्ता और मान्यता के टकराव को उजागर करता है।


Vijay P. Singh

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