उत्तर प्रदेश की राजनीति: सियासी शतरंज, संतों की आवाज और 2027 की दस्तक

उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों कई परतों में चल रही है। एक तरफ विकास और कानून-व्यवस्था का दावा है, दूसरी ओर सामाजिक न्याय, बेरोजगारी और जातीय समीकरण की बहस। इसी बीच प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा प्रकरण भी राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया, जिसने धर्म और राजनीति के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी है।
भाजपा: विकास, धर्म और राष्ट्रवाद का त्रिकोण
भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में अपने शासन मॉडल को मजबूती से पेश कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था, धार्मिक पर्यटन, इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश को प्रमुख उपलब्धि बताया जा रहा है। अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे धार्मिक स्थलों का विकास भाजपा की राजनीतिक कथा का अहम हिस्सा है।
माघ मेले में संत समाज से जुड़े मुद्दों पर भी भाजपा की भूमिका पर निगाहें रहीं। विपक्ष ने आरोप लगाया कि कुछ धार्मिक आवाजों की अनदेखी की जा रही है, जबकि भाजपा ने इसे प्रशासनिक विषय बताते हुए राजनीतिक रंग देने से इनकार किया। पार्टी का प्रयास है कि संत समाज और हिंदू मतदाताओं के बीच अपना विश्वास कायम रखे।
अविमुक्तेश्वरानंद महाराज प्रकरण: धर्म बनाम सत्ता?

प्रयागराज के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा घटनाक्रम अचानक राजनीतिक विमर्श में आ गया। उनके बयानों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर उठे विवाद ने विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर दिया।
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इसे “संतों की उपेक्षा” और “अभिव्यक्ति पर दबाव” जैसे मुद्दों से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा। वहीं भाजपा समर्थकों का तर्क है कि धार्मिक आयोजनों में व्यवस्था और सुरक्षा सर्वोपरि होती है, और प्रशासन का काम नियमों का पालन कराना है, न कि किसी पक्ष का समर्थन या विरोध करना।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में संत समाज की आवाज का हमेशा प्रभाव रहा है। ऐसे में किसी भी धार्मिक व्यक्तित्व से जुड़ा विवाद तुरंत सियासी अर्थ ग्रहण कर लेता है।
समाजवादी पार्टी: पीडीए और धार्मिक संतुलन

अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भाजपा पर लगातार हमलावर है। पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण के साथ-साथ सपा अब यह संदेश देने की कोशिश में है कि वह संत समाज के सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी है।
माघ मेले के प्रकरण को सपा ने सरकार की “दोहरे मापदंड” की राजनीति से जोड़कर प्रस्तुत किया। हालांकि भाजपा इसे राजनीतिक अवसरवाद बता रही है।
बसपा: रणनीतिक मौन

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती इस पूरे घटनाक्रम पर अपेक्षाकृत शांत रहीं। बसपा की राजनीति फिलहाल संगठन को मजबूत करने और अपने कोर दलित वोट बैंक को सहेजने पर केंद्रित दिखती है। हालांकि पार्टी समय-समय पर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक निष्पक्षता के मुद्दे उठाती रही है।
कांग्रेस: संवैधानिक अधिकारों की बात
कांग्रेस ने संत प्रकरण को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के संदर्भ में उठाया। पार्टी नेताओं का कहना है कि धार्मिक आयोजनों में भी सभी को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

प्रदेश में कांग्रेस अपनी जमीन तलाश रही है और ऐसे मुद्दों के जरिए खुद को संवैधानिक मूल्यों की पक्षधर पार्टी के रूप में पेश कर रही है।
छोटे दल और बदलते समीकरण
रालोद, सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) जैसे दल फिलहाल अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर ये दल परिस्थिति के अनुसार रुख तय करते हैं।
धर्म, विकास और सामाजिक न्याय की त्रिकोणीय जंग
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब सिर्फ जातीय गणित ही नहीं, बल्कि धार्मिक विमर्श भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है। माघ मेले से जुड़ा प्रकरण यह संकेत देता है कि संत समाज की आवाज और सरकार के साथ उसका संबंध भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकता है।
भाजपा विकास और धार्मिक पहचान के सहारे अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहती है, सपा सामाजिक न्याय और संतुलन की बात कर रही है, बसपा अपने आधार को सहेज रही है और कांग्रेस संवैधानिक मूल्यों की दुहाई दे रही है।
2027 अभी दूर है, लेकिन सियासी तापमान अभी से बढ़ चुका है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर घटना, चाहे वह प्रशासनिक हो या धार्मिक, पल भर में चुनावी मुद्दा बन सकती है। यही इस प्रदेश की राजनीति की खासियत भी है—और रोमांच भी।


